Blood

खून की कमी ( Anemia )

 

 

हमारे खून की लाल रक्त कणिकाओं (RBCs) में हीमोग्लोबिन नामक एक पदार्थ होता है जोकि  फेफड़ों से ऑक्सीजन लेकर उसे शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंचाता है. सामान्यतः 100 मिली खून में इसकी मात्रा पुरुषों में 13.5 से 17.5 ग्राम व स्त्रियों में 12 से 16 ग्राम तक होती है. इसकी मात्रा कम होने को एनीमिया (anemia, खून की कमी) कहते हैं. जो लोग गरीब व अनपढ़ हैं उनके भोजन में पौष्टिक तत्व कम होने के कारण उनमें खून की कमी अधिक होती है. पढ़े-लिखे और संपन्न लोगों में भी संतुलित आहार के विषय में जानकारी न होने के कारण अक्सर खून की कमी पाई जाती है.

हड्डियों के भीतर पाई जाने वाली अस्थि मज्जा (bone marrow) खून का निर्माण करती है. इसके लिए उसे मुख्य रूप से प्रोटीन, आयरन (iron, लोहा), विटामिन बी12, फोलिक एसिड एवं कुछ अन्य विटामिन, मिनरल्स व हार्मोन चाहिए होते हैं. इन में से किसी की भी कमी होने पर खून का बनना कम हो जाता है. बोन मैरो में कोई बीमारी होने से भी खून नहीं बन पाता है. जिन लोगों को किसी कारण से शरीर से खून निकलता है (अल्सर, खूनी बवासीर, अधिक मासिकधर्म, पेट में हुक वर्म आदि) उन्हें भी खून की कमी हो जाती है. बोन मैरो में बनने वाली RBCs औसतन 90 से 120 दिन तक खून में सर्कुलेट करती हैं व उसके बाद नष्ट हो जाती हैं. जितनी पुरानी RBCs नष्ट होती हैं उतनी ही नई RBCs बन कर उनका स्थान लेती जाती हैं. इस प्रकार खून में हीमोग्लोबिन की मात्रा स्थिर रहती है. कुछ बीमारियों में आरबीसी जल्दी नष्ट होने लगती हैं, इस कारण से भी खून की कमी हो सकती है.

शरीर में खून लगातार बनता रहता है व लगातार नष्ट होता रहता है इसलिए स्वस्थ व्यक्ति को रक्तदान करने से कोई हानि नहीं होती. केवल चार-पांच दिन में ही दिया हुआ खून पूरा हो जाता है.

यदि किसी व्यक्ति को खून की कमी हो तो उसकी जांच कराकर यह डायग्नोस करना आवश्यक होता है कि खून क्यों नहीं बन रहा है या खून क्यों नष्ट हो रहा है. जब तक उचित डायग्नोसिस करके उसका इलाज न किया जाए तब तक खून की कमी को पूरा नहीं किया जा सकता. यदि किसी व्यक्ति में खून की बहुत अधिक कमी होने से जीवन को खतरा है तो उसको खून चढ़ाया जाता है जिससे खून बनने के लिए कुछ समय मिल जाए. किस कारण से कमी हो रही है उसका उचित इलाज किए बिना खून चढ़ाने से कोई फायदा नहीं होता क्योंकि जितना भी खून चढ़ाया जाए सब नष्ट हो जाता है.

लक्षण : खून की कमी के कुछ सामान्य लक्षण होते हैं जो सभी मरीजों में पाए जाते हैं. कुछ विशेष लक्षण उस कारण से संबंधित होते हैं जिससे खून की कमी हुई है.

खून की थोड़ी कमी होने से मरीज को कमजोरी महसूस होती है व जल्दी थकान होने लगती है, बच्चों में बढ़वार धीमी हो जाती है, गर्भवती महिलाओं में गर्भ में पल रहे शिशु का विकास कम हो जाता है, हृदय रोगियों में एंजाइना, सांस फूलना व सूजन आदि बढ़ जाती है.

खून की अधिक कमी होने पर यह सब लक्षण और बढ़ जाते हैं. इसके अतिरिक्त मांसपेशियों में दर्द, रात को पैरों में अत्यधिक दर्द, भूख कम होना, खाने का पाचन ना होना, मुंह में छाले होना, धड़कन होना, सांस फूलना, सर में धक धक होना इत्यादि लक्षण हो सकते हैं. जिन लोगों में आयरन की कमी से खून नहीं बन रहा होता है उनमें कभी-कभी मिट्टी, चॉक, कागज या कच्चे चावल खाने की प्रवृत्ति पाई जाती है. जिन लोगों में विटामिन बी12 की कमी से खून कम बन रहा हो उनको सांस अधिक फूलना, दिमागी परेशानी होना, पैरों में लकवा मारना, हल्का पीलिया होना इत्यादि की शिकायत हो सकती है.

RBCs जल्दी नष्ट होने के कारण होने वाली खून की कमी को हीमोलिटिक एनीमिया कहते हैं. इसके बहुत से कारण होते हैं जिनमें से अधिकतर जन्म से ही पाए जाते हैं. इन मरीजों में हल्का पीलिया होता है एवं जिगर और तिल्ली बढ़ जाते हैं. थैलेसीमिया इसका सबसे कॉमन उदाहरण है.

शरीर से खून निकलने के कारण एनीमिया होने के तीन मुख्य कारण हैं. महिलाओं में अधिक मासिक धर्म (माहवारी, menses) होने से खून की कमी हो जाती है. जिन लोगों को बवासीर के कारण खून जाता है उनमें भी खून की कमी हो जाती है. जिन लोगों को एसिड अधिक बनने की बीमारी होती है उनके आमाशय में छोटे-छोटे अल्सर बन जाते हैं जिनसे थोड़ा थोड़ा खून रिसता रहता है. क्योंकि भोजन के साथ मिलकर इसका पाचन हो जाता है इसलिए यह खून लैट्रिन में दिखाई नहीं देता. अधिक खून निकलने पर लैट्रिन का रंग काला हो जाता है. एसिडिटी के बहुत से मरीजों को सीने में जलन व खट्टी डकारे नहीं होती इसलिए उन्हें इसका एहसास नहीं होता लेकिन इस प्रकार खून रिसते रहने से उन्हें खून की कमी हो जाती है. चाय, गरम मसाला, मिर्च, खट्टी चीजें, जूस, तमाखू, शराब व दर्द निवारक दवाएं इस प्रकार के अल्सरों को बढ़ाते हैं इसलिए इनका सेवन कम से कम करना चाहिए. एसिडिटी को कम करने के लिए लोग दवाएं खाते रहते हैं जिनसे आयरन और विटामिन B12 शरीर में ऐब्ज़ोर्ब नहीं होते व खून की कमी हो जाती है.

सामान्य शाकाहारी वेजिटेरियन भोजन में आयरन की मात्रा बहुत कम होती है इस कारण से हमारे देश में आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया बहुत लोगों में पाया जाता है. महिलाओं में मासिक धर्म के कारण यह कुछ अधिक होता है. गर्भावस्था में शरीर को अधिक आयरन की आवश्यकता होती है इसलिए यह एनीमिया और बढ़ जाता है. महिलाओं को मीनोपॉज होने तक आयरन की गोलियां अवश्य खानी चाहिए. जिन लोगों को आयरन की कमी होती है उन्हें खून में हीमोग्लोबिन पूरा हो जाने के बाद लगभग 6 महीने तक आयरन की गोलियां अवश्य लेना चाहिए जिससे शरीर में आयरन के स्टोर पूरे हो सकें.

शाकाहारी भोजन मैं सेब व पालक में आयरन की कुछ मात्रा पाई जाती है. यदि सब्जियों को लोहे की कढ़ाई में बनाया जाए तो उससे आयरन का कुछ अंश मिल सकता है. पीतल के भगौने का भी कभी-कभी प्रयोग करना चाहिए इससे हमें सूक्ष्म मात्रा में कॉपर और जिंक मिलते हैं जो कि खून बनने में सहायक होते हैं. अनार और चुकंदर में आयरन बिल्कुल नहीं होता है.

मीट एवं मछली में आयरन अच्छी मात्रा में होता है लेकिन इनमें अधिक मसाले डालने और तलने से उनकी पौष्टिकता कम हो जाती है. अंडे में आयरन नहीं होता है लेकिन प्रोटीन अच्छी मात्र में होता है. खून बनने के लिए बहुत से विटामिंस व मिनरल भी आवश्यक होते हैं जो कि हमें ताजे फलों व सब्जियों से मिलते हैं. भोजन में प्रोटीन भी अच्छी मात्रा में होना चाहिए जो कि हमें दूध की बनी चीजों, दाल, चना व नॉन वेज भोजन से मिलता है.

थायराइड की कमी से भी खून बनना कम हो जाता है जोकि थायराइड हारमोन देने से ही पूरा होता है. शरीर में कोई भी पुराना इंफेक्शन या गठिया संबंधी रोग हो तो भी खून बनना कम हो जाता है जोकि उस बीमारी के इलाज से ही ठीक होता है.

आयरन की कमी से नाख़ून चम्मच जैसे हो जाते हैं

खून की कमी की डायग्नोसिस होते ही  अधिकतर लोग अनार का जूस पीना शुरू कर देते हैं. सच यह है कि अनार, चुकंदर व टमाटर में आयरन बिल्कुल नहीं होता. अनार का जूस खट्टा होता है इसलिए एसिडिटी कर के और नुकसान पहुंचाता है. सभी प्रकार के जूस से इंफेक्शन का भी डर होता है इसलिए किसी भी जूस का सेवन नहीं करना चाहिए. बहुत से डॉक्टर खून की कमी देखकर आयरन के टॉनिक या कैप्सूल शुरू कर देते हैं जो कि गलत है. खून की कमी के कुछ कारण ऐसे भी हैं जिनमें आयरन नुकसान कर सकता है, इसलिए खून की कमी का इलाज विधिवत जांचें कराकर योग्य चिकित्सक द्वारा ही करा ना चाहिए.

                                     डॉ. शरद अग्रवाल एमडी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *