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क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस एवं दमा ( Chronic Bronchitis and Asthma )

क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस एवं दमा ( Chronic Bronchitis and Asthma )

वायु मंडल में लगातार बढते धुएं व हानिकारक रसायनों के कारण सांस की बीमारियाँ बढ़ रहीं हैं. ये बीमारियाँ मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं –

क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस : यह एक हलके हलके आरम्भ होने और बढ़ने बाली बीमारी है. यह धुम्रपान करने वालों में अधिक होती है. खांसी आना व बलगम बनना इसके खास लक्षण हैं. फिर धीरे धीरे साँस फूलना शुरू हो जाता है. जाड़ों में यह परेशानी अधिक होती है. जुकाम या वायरल फीवर इत्यादि होने पर इसकी परेशानी एकदम से बढ़ जाती है. सिगरेट व अन्य सभी प्रकार के धुएं, धूल एवं वायु प्रदुषण इस बीमारी को लगातार बढ़ाते हैं.

क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस से बचाव के लिए सिगरेट या बीडी पीना बिल्कुल छोड़ देना चाहिए व धूल और धुंए से जितना हो सके बचाव करना चाहिए. यदि कभी जुकाम, बुखार इत्यादि के साथ पीला बलगम आने लगे तो उसका तुरंत इलाज कराना चाहिए. नियमित शारीरिक व्यायाम व सांस खींचने व छोड़ने के व्यायाम इसमें लाभ पहुंचाते हैं.

दमा : यह एक भिन्न प्रकार की बीमारी है जिसमें हवा में मौजूद धूल, पराग कण, बारीक़ रेसे एवं रसायनों आदि से एलर्जी के कारण साँस की नलियां एकदम से सिकुड़ जाती हैं. इससे अत्यधिक खांसी एवं साँस में कठिनाई होती है. इस प्रकार के अटैक कुछ कुछ समय बाद होते हैं व अटैक ख़त्म होने के बाद रोगी लगभग ठीक हो जाता है. जिन बस्तुओं से एलर्जी हो उनसे यदि बचा जाय तो दमे के अटैक कम पड़ते है. यदि किसी स्थान विशेष पर रहने से दमे के अटैक बढ़ जाएँ तो स्थान बदलने से कम हो सकते हैं. कई बार देखा जाता है कि दूसरे मकान, मोहल्ले या शहर में जानें पर दमे के अटैक कम या अधिक होने लगते हैं. अलग अलग स्थानों पर वातावरण में पाय जाने वाले एलर्जी करने बाले तत्वों की मात्रा कम या ज्यादा होने से ऐसा होता है. दमे के इलाज में दो प्रकार की दवाएं काम में लाई जाती हैं. अटैक को कंट्रोल करने वाली दवाएं एवं अटैक पड़ने से रोंकने के लिए बचाव कारक दवाएं. दवाओं के उचित प्रयोग द्वारा व जिन वस्तुओं से एलर्जी हो उनसे बचाव करने पर दमे की समस्या पर लगभग पूर्ण नियंत्रण किया जा सकता है.

दमे के इलाज के लिए इन्हेलर्स सबसे अधिक उपयुक्त रहते हैं.

खाने वाली दवाएं अधिक मात्रा में खांनी पड़ती हैं. वे पहले पेट में पहुँच कर अमाशय को हानि पहुँचा सकती हैं. फिर खून के द्वारा वे शरीर के उन सभी अंगों में पहुँचती हैं जहाँ उनकी जरुरत नहीं है. इससे रोगी को बहुत से नुकसान हो सकते है. इन्हेलर्स के द्वारा उन्हीं
दवाओं की बहुत थोड़ी मात्रा केवल सांस की नलियों में ही पहुंचाई जाती है जहाँ उनकी आवश्यकता है. इन्हेलर्स अपना आदी नहीं बनाते. कोई भी बीमारी यदि लाइलाज है तो उसके लिए आप जो भी दवा लेंगें वह आप को लगातार लेनी होगी चाहे वह गोली हो या इन्हेलर्स. ऐसे में इन्हेलर्स लेना अधिक लाभदायक है क्योंकि उनके साइड इफैक्ट नहीं के बराबर होते हैं. इन्हेलर लेने के बाद कुल्ला अवश्य कर लेना चाहिए व थोड़ा पानी पी लेना चाहिए.

क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस के इलाज में भी गोलियों के स्थान पर इन्हेलर्स अधिक उपयुक्त रहते हैं. कुछ दमे के रोगियों को व्यायाम करने से सांस के दौरे पड़ते हैं. ऐसे रोगियों को व्यायाम से पहले इन्हेलर्स का प्रयोग करना चाहिए. इसके लिए स्टीराइड का इन्हेलर अधिक उपयोगी होता है. व्यायाम ऐसे स्थान पर करना चाहिए जहाँ धूल न हो.

साँस के मरीजों के लिए परहेज़ : साँस की बीमारी में खाने पीने की बस्तुओं के परहेज से भी अधिक आवश्यक है साँस के द्वारा फेफड़ों में पहुँचने वाले एलर्जी करने वाले बारीक़ कड़ों का परहेज. साँस के रोगी, चाहे वे क्रोनिक ब्रोंकाइटिस के मरीज हों अथवा एलर्जी से होने वाले दमे के, उनके लिए निम्न परहेज आवश्यक हैं –

खाने के पदार्थ :  साँस के रोगियों को सामान्यत: ठंडा पानी, कोल्ड ड्रिंक्स, ठंडा दही, आइसक्रीम आदि का सेवन नहीं करना चाहिए. खट्टी एवं मसाले दार वस्तुएं गला ख़राब करती हैं व एसिडिटी को बढाती हैं. एसिडिटी से भी साँस की परेशानी बढ जाती है. इस कारण से साँस के रोगी को चाय, काफी, कालीमिर्च, अदरख, जूस व टोमैटो सूप आदि का सेवन नहीं करना चाहिए. ताजे बने हुए चावल, दाल व सब्जियां हानि नहीं पहुंचातीं. दूध से बलगम नहीं बनता है. ताजा दही व मीठे फल सामान्यत: नुक्सान नहीं पहुंचाते हैं. ठन्डे व खट्टे फल और जूस नुकसान कर सकते हैं, अत इनका सेवन नहीं करना चाहिए. जिन लोगों को एलर्जिक अस्थमा का रोग है उन्हें कुछ विशेष खाद्य पदार्थों से एलर्जी हो सकती है. यदि साँस का रोगी यह अनुभव करता है कि कोई विशेष चीज खाने से उसकी साँस फूलती है तो उसे उस का परहेज करना चाहिए. साँस के रोगियों को पान मसाला, सुपारी, पान व तम्बाकू बहुत अधिक हानि पहुंचाते हैं इनका सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए.

साँस के द्वारा फेफड़ों में पहुँचाने वाले पदार्थ : धूम्रपान (सिगरेट, बीड़ी, हुक्का, चिलम पीना) साँस के रोगियों के लिए सबसे बड़ा जहर है. यदि किसी साँस के रोगी के आस पास भी कोई सिगरेट, बीड़ी पीता है तो उसके धुंए से भी साँस के रोगी को अत्यधिक नुकसान होता है. जिन को साँस की बीमारी नहीं है उनको भी लगातार धूम्रपान करने से साँस की बीमारी हो जाती है. धूम्रपान के अतिरिक्त और भी जितने प्रकार के धुएं होते हैं, सभी फेफड़ों को हानि पहुंचाते हैं (जैसे अगरबत्ती, धूपबत्ती, कछुआ अगरबत्ती, रसोई का धूँआ, फैक्ट्रियों, वाहनों व जनरेटर का धुँआ इत्यादि). जितना संभव हो सके इनसे बचना चाहिए. यदि घर के आस पास अत्यधिक प्रदूषण हो तो मकान बदलने से रोगी को लाभ हो सकता है. सभी प्रकार की खुशबूदार चीजें जैसे परफ्यूम, टैलकम पाउडर, रूम स्प्रे, डिओडोरैंट, आइल पेंट, गुड नाईट आदि भी फेफड़ों को हानि पहुचाते हैं. सभी प्रकार की बारीक़ धूल विशेषकर अनाज फटकने से, बिस्तर व कालीन झाड़ने से, दीवारों को रेगमाल करने से और तोड़ फोड़ से उड़ने वाली गर्द व सीमेंट बहुत हानिकारक होते हैं. यदि ऐसा कार्य करना आवश्यक हो तो मुहं व नाक पर गीला कपडा बांध कर इस प्रकार का कार्य करना चाहिए. घर में सफाई करने के लिए यदि वैक्यूम क्लीनर का उपयोग किया जाय व झाड़ू के स्थान पर केवल पोंछा लगाया जाय तो धूल से कुछ हद तक बचा जा सकता है. बिस्तर पर पाई जाने वाली बारीक़ धूल में एक बहुत छोटा पिस्सू के समान हॉउस डस्ट माइट पाया जाता है. बहुत से लोगों को इससे ऐलर्जी होने के कारण दमे के अटैक होते हैं. इससे बचने के लिए बिस्तर की चादर को सोने से पहले रोज बदलना चाहिए व पानी से धोकर धूप में सुखा देना चाहिए. बहुत से लोगों को पराग कण, भूसे व जानवरों के रोएँ से ऐलर्जी होती है. यदि ऐसा है तो इनसे बचना चाहिए. कुछ लोगों को पार्थेनियम घास (सड़कों के किनारे अपने आप उगने वाली खर पतवार जिसमें छोटा सा सफ़ेद फूल होता है) से ऐलर्जी होती है. यदि इस प्रकार की घास आस पास उगी हो तो उसे नष्ट करवा देना चाहिए. कुछ दवाएं साँस के रोग को बढ़ा सकती हैं. इन में  एस्प्रिन व बीटा ब्लाकर्स (ब्लड प्रेशर व ऐन्जाइना के लिए प्रयुक्त) मुख्य हैं. बाजार में बिकने वाली दर्द निवारक दवाएं भी हानि कारक हो सकती हैं व ब्लड प्रेशर की दवाएं भी योग्य डाक्टर से परामर्श ले कर ही खानी चाहिए.

कुछ विशेष व्यायाम : साँस के मरीजों को व्यायाम से बहुत लाभ होता है –

  1.  साँस को जितना अन्दर खींच सकें उतना भर कर जितनी देर तक रोक सके रोकें और फिर जितना निकाल सकें निकाल दें. फिर कुछ सामान्य साँसें लें, पुनः इस प्रक्रिया को दोहराएँ. दिन में कई बार इस प्रकार करें.
  2.  जोर से फूंक मारें, गुब्बारा फुलाएं या शंख बजाएँ.
  3.  बाँहों एवं सीने की मांसपेशियों को मजबूत करने के लिए हलके डम्बल्स या स्प्रिंग आदि से व्यायाम करें.
  4.  कोई भी एयरोबिक व्यायाम जैसे तेज चलना, दौड़ना, जागिंग, साईकिल चलाना, खेलना तैरना आदि जितना आसानी से कर सकें उतना करना चाहिए.

विशेष : दमे के रोगियों को यह बात भली भाँति समझ लेना चाहिए कि साँस को सबसे अधिक और सबसे शीघ्र आराम स्टीराइड दवाओं (बेट्नीसाल, डेकाड्रान, प्रेड्नीसोलोन) आदि से आता है. ये दवाएं एक दम आराम पहुचातीं हैं. लेकिन फिर मरीज इनका आदी हो जाता है. लम्बे समय में ये दवाएं बहुत नुकसान पहुंचाती हैं. साँस की दवाएं बेंचने वाले बहुत से ठग टाइप के हकीम आदि लोग अपनी पुड़ियों में ये गोलियां पीस कर डाल देते हैं. इसी प्रकार हैदराबादी मछली दवा के नाम पर भी कुछ जाल साज लोग स्टीराइड दवाएं खिलाते हैं. दमे के मरीजों को ऐसे ठगों के चुंगल में नहीं फसना चाहिए.

याद रखें – दमा को लाइलाज बीमारी कहना गलत है क्योंकि उचित दवाओं और परहेज द्वारा इसको भली भाँति कंट्रोल किया जा सकता है. प्रदूषण के बढ़ने के साथ  वातावरण में एलर्जी करने वाले तत्वों की मात्रा बढती है. इसलिए अब दमे की बीमारी पहले के मुकाबले बढ़ गई है. एलर्जी की टेंडेसी को किसी भी दवा से (चाहे वह किसी भी पैथी की हो) दूर नहीं किया जा सकता. इसलिए दमे को जड़ से खत्म नहीं किया जा सकता. जब तक ऐसी कोई दवा नहीं बन जाती तब तक दमे को फिलहाल उपलब्ध दवाओं एवं इन्हेलर्स से ही कंट्रोल करना चाहिए. दमे की शुरुआत में साँस की नलियों की सिकुड़न दवाओं व इन्हेलर्स से कुछ समय के लिए बिलकुल ठीक हो जाती है. एलर्जी करने वाले तत्वों के बार बार साँस की नली में पहूँचने से यह सिकुडन बार बार होती है. धीरे धीरे साँस की नलियां स्थाई रूप से सिकुड़ जाती हैं और व्यक्ति साँस का रोगी बन जाता है. इस शुरूआती अवस्था में यदि इन्हेलर का प्रयोग नियमित रूप से किया जाय तो साँस की नलियों में होने वाली सिकुड़न को रोका जा सकता है.

क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस के मरीजों में मौसम बदलने के साथ बीमारी घटती बढ़ती है तथा वायरल इन्फेक्शन या न्यूमोनिया होने से यह एकदम से बढ़ जाती है (exacerbation). जब भी बीमारी बढ़ती है, उसे दवाओं की मात्रा बढ़ा कर व अन्य आवश्यक चीज़ें बढ़ा कर (जैसे ऑक्सीजन, नेबुलाइज़र, एंटीबायोटिक्स, वेंटिलेटर आदि से कंट्रोल करना होता है तथा मरीज़ को अस्पताल में भर्ती करना पड़ सकता है.

सांस के मरीजों को इन्फ्लुएंजा या न्यूमोनिया होने से बहुत खतरा होता है इसलिए सांस के मरीजों को इन बीमारियों के लिए नियमित टीके लगवाने चाहिए. इन्फ्लुएंजा का नया टीका हर साल जुलाई अगस्त में आता है इसलिए इसको हर साल लगवाना होता है जबकि न्यूमोनिया का टीका पांच साल में एक बार लगता है. (देखिये – वयस्क टीकाकरण)

बच्चों में दमा : जिन बच्चों को एलर्जिक अस्थमा (दमा) होता है उन में से बहुतों का दमा 11-12 साल की आयु में आ कर ठीक हो जाता है. यह जानने के लिए कोई टेस्ट नहीं है. कि किस बच्चे में यह ठीक हो जायेगा व किस में नहीं. जिन में यह ठीक हो जाता है उन में से भी कुछ में वयस्क होने पर यह दोबारा शुरु हो सकता है.  बच्चों में भी दमा का कंट्रोल अधिकतर इन्हेलर से ही करना चाहिए क्योंकि स्टीराइड दवाएं (बेटनीसाल) आदि लेने से बच्चों की बढ़वार रुक जाती है.

कुछ उपयोगी विडियो लिंक

https://www.youtube.com/watch?v=2reYNq2Jzs0     ल्यूपिहेलर से कैप्सूल किस प्रकार लें.

https://www.youtube.com/watch?v=J8lByAUQNiA    स्पेसर की मदद से इनहेलर का प्रयोग.

सांस के व्यायाम (विडियो)

डॉ. शरद अग्रवाल एम डी

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